लुधियाना- टेक्सटाइल मजदूरों ने डी.सी. कार्यालय पर प्रदर्शन किया.
अक्टूबर 14, 2011
लुधियाना- टेक्सटाइल मजदूरों ने डी.सी. कार्यालय पर प्रदर्शन किया.
Posted by Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar under UncategorizedLeave a Comment
सितम्बर 19, 2008
हिन्दुस्तान भी अजब देश है| यहाँ के नेता भी अजीबो-ग़रीब हैं| बैठे-ठाले विचार किया कि चलो एक सविधान ही तैयार कर लें कि हम हिन्दुस्तान में कैसा राज चाहते हैं| तुरंत सर्वदलीए कांफ्रेंस बुलाई गयी, जिसमें नेहरू स्मिति बनाई गयी कि वह एक रिपोर्ट तैयार करे| रिपोर्ट तैयार हो गयी और प्रकाशित भी की गयी| बड़ी प्रशंसा हो रही है, बड़ी शलाघा हो रही है| तारीफों के पुल बाँधे जा रहे हैं| रिपोर्ट का अर्थ क्या है? क्या हमें भी सरकार कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और आयरलैंड जैसा राज दे दे? बहुत खूब! वायसराय अंग्रेज होगा जो काफ़ी अधिकार संपन्न होगा| लेकिन चुनाव से ही कौंसिल और अस्सेम्बली में सदस्य भेजे जाएँगे और चुनाव में मत देने का अधिकार बालिग व्यक्तियों को ही होगा| सदन में वे स्वयं कुछ नहीं कर सकेंगे| केवल वायसराय की उंगलियों पर नाचेंगे|
ऐसा लगता है कि वे कनाडा, और आयरलैंड आदि के संविधान खोलकर और सामने रखकर बैठ गये और यह रिपोर्ट लिख दी| लेकिन स्मास्या यह है कि यह रिपोर्ट लिखी क्यों गयी? जब असहयोग आंदोलन जोरों पर था, उस समय बाबू भगवानदास आदि ज़ोर शोर से अपनी बातें उठाते रहे, लेकिन किसी ने स्वराज्य की व्याख्या करने की आवश्यकता न समझी| पर आज जबकि कोई आंदोलन भी नही है, संविधान तैयार करके रख दिया गया है| आख़िर इसका क्या कारण है? असल में बात यह है कि कुछ लोगों के विचार हैं कि अगर साइमन कमिशन बना है तो यह ज़रूर कुछ न कुछ देने के लिए ही बना है| और अब सरकार आने वाली जंग और अन्य देशों की स्थितियों को सामने रखती हुई हिन्दुस्तान को कुछ न कुछ देने को तैयार है| कमीशन का बहिष्कार तो इसलिए किया जा रहा है कि कमीशन में कोई हिन्दुस्तानी स्दस्य नहीं है, और तो कोई बात नहीं| और अब सीधे नहीं बल्कि यों ही दूसरी तरह से कमीशन को बताना चाहते हैं कि हम यह कुछ लेना चाहते हैं| एक सज्जन ने अच्छा उदाहरण दिया कि एक फकीर ने अपनी लंबी लाठी से एक लोटा बाँध लिया और कहने लगा – मुझे भीख नहीं चाहिए, मेरे लोटे को दे दो! हमारे उग्र नेताओं की यह स्थिति है| ये सभी समझ बैठे हैं कि अब कुछ न कुछ मिलकर ही रहेगा| इसलिए बता दें कि हम क्या लेना चाहते हैं| अकल के अंधे नेता आयरलैंड के समान अधिकार तो ज़रूर माँगते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि आयरलैंड की जनता ने ये अधिकार किस तरह लिए हैं? 1916 से 1923 तक एड़ी – चोटी का ज़ोर लगाकर वे अँग्रेज़ों से संघर्ष करते रहे और इन अँग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया| तंग आकर, मजबूर होकर जब वहाँ से जड़ें बिल्कुल ही उखड़ गयीं तब उन्होने उनको थोड़े बहुत अधिकार दिए| और हम चाहते हैं कि हमने बैठकर बतियाया है, इसलिए हमें भी उनके समान अधिकार मिल जाने चाहिए! कितनी बड़ी गलतफहमी है? अच्छा फिर यह तो है ही बड़ा भारी द्रोह| अभी पिछली कांग्रेस में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास हुआ था| और अब उन्होने तुरंत ही डोमेनीयन स्टेट्स बनाया जाना मंजूर कर लियाहै| इसका क्या अर्थ है? कहा जाता है कि यह कांग्रेस पार्टी थोड़े ही थी, जिसने कांग्रेस के साथ द्रोह किया हो, यह तो है सर्वदलीय कान्फ्रेंस| बहुत खूब! तुम कांग्रेस वाले ही समझौते के ठेकेदार हो गये हो! उदारवादी नेताओं ने क्यों न समझौता करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता स्वीकार क़ी? उन्हें तो हिन्दुस्तान क़ी स्वतंत्रता क़ी कोई आवश्यकता नहीं? तब कांग्रेस के होने वाले अध्यक्ष पंडित मोती लाल नेहरू आदि कांग्रेस को पीछे खींचने का यतन न करेंगे? समझ नहीं आता कि पंडित जवाहर लाल आदि जोकि समाजवादी विचारों के समर्थक हैं, क्यों इस स्मिति में शामिल होकर अपना आदर्श बदल सके? क्या वह इन्क़लाब नहीं चाहते? वैसे ही इन्क़लाब – इन्क़लाब चिल्लाते रहते हैं? क्या उन्हे आशा है कि यह सरकार स्वयं ही, जो माँगें प्रस्तुत क़ी गयी हैं उन्हे स्वीकार कर लेगी? (ऐसा सोचना ) जान – बूझकर आँखें मूंदना है| या नेहरू साहब केवल सरकार को भयभीत करने के लिए ही पूर्ण स्वतंत्रता का शोर मचाते रहते हैं और चाहते अधीन राज ही हैं? असल में यह आशा कि अभी कुछ मिलेगा, अभी कुछ मिलेगा, बहुत बर्बाद करती है | दास , बरकेन हैड क़ी चापलूसी में कितना गिर गया था, यह उसके फ़रीदपुर के संबोधन से ही पता चल सकता है| आज सभी नेता उस राह पर चल पड़े है|
स्वतंत्रता कभी दान में प्राप्त नहीं होगी| लेने से मिलेगी| शक्ति से हासिल क़ी जाती है| जब ताक़त थी तब लॉर्ड रीडिंग गोल मेज कांफ्रेंस के लिए महात्मा गाँधी के पीछे – पीछे फिरता था और अब जब आंदोलन दब गया, तो दास और नेहरू बार बार ज़ोर लगा रहे हैं और किसी ने गोलमेज तो दूर , ” स्टूल कान्फ्रेंस ” भी न मानी| इसलिए अपना और देश का समय बर्बाद करने से अच्छा है कि मैदान में आकर देश को स्वतन्त्रता – संघर्ष के लिए तैयार करना चाहिए| नहीं तो मुँह धोकर सभी तैयार रहें कि आ रहा है –स्वराज्य का पार्सल!
नौजवानों को इन बहकावो से बचकर चुपचाप अपना काम करते रहना चाहिए|
सितम्बर 19, 2008
( जुलाई, १९२८ के ‘ किरती ‘ में छपे इस लेख में भगत सिंह ने सुभाष चन्द्र बोस और जवाहर लाल नेहरू के विचारों की तुलना की है| बाद में इतिहास ने भगत सिंह के इन विचारों की पुष्टि की )
असहयोग आंदोलन की असफलता के बाद जनता में बहुत निराशा और मायूसी फैली| हिंदू मुस्लिम झगड़ों ने बचा खुचा साहस भी ख़तम कर डाला| लेकिन देश में जब एक बार जागृति फैल जाए तब देश ज़्यादा दिन तक सोया नहीं रह सकता| कुछ ही दिन के बाद जनता बहुत जोश के साथ उठती तथा हमला बोलती है| आज हिन्दुस्तान में फिर जान आ गयी है| हिंदोस्ताँ फिर जाग रहा है| देखने में तो कोई बड़ा जनआंदोलन नज़र नही आता लेकिन नींव ज़रूर मजबूत की जा रही है| आधुनिक विचारों के अनेक नये नेता सामने आ रहे हैं| इस बार नौजवान नेता ही आगे बढे हैं और देश में नौजवानों के ही आंदोलन चल रहे हैं| नौजवान नेता ही देशभक्त लोगों की नज़रों में आ रहे हैं| बड़े बड़े नेता बड़े होने के बावजूद एक तरह से पीछे छोड़े जा रहे हैं| इस समय जो नेता आगे आए हैं – बंगाल के पूजनीए श्री सुभाष चन्द्र बोस और माननीय पंडित श्री जवाहर लाल नेहरू| यही दो नेता हिन्दुस्तान में उभरते नज़र आ रहे हैं और युवाओं के आंदोलनो में विशेष रूप से भाग ले रहे हैं| दोनो ही हिंदोस्तान की आज़ादी के कट्टर समर्थक हैं| दोनो ही समझदार और सच्चे देशभक्त हैं| लेकिन फिर भी इनके विचारों के बीच में ज़मीन – आसमान का अंतर है| एक को भारत की प्राचीन संस्कृति का उपासक कहा जाता है तो दूसरे को पक्का पश्चिम का शिष्य| एक को कोमल हृदयवाला भावुक कहा जाता है तो दूसरे को पक्का युगांतरकारी| हम इस लेख में उनके अलग अलग विचारों को जनता के समकक्ष रखेंगे, ताकि जनता स्वयं उनके अंतर को समझ सके और स्वयं भी विचार कर सके| लेकिन उन दोनो के विचारों का उल्लेख करने से पूर्व एक और व्यक्ति का उल्लेख करना भी ज़रूरी है जोकि इन्ही की भाँति स्वतंत्रता प्रेमी है और युवा आंदोलनों की एक विशेष शख्सियत है | साधु वासवानी जो चाहे कॉंग्रेस के बड़े नेताओं की भाँति जाने माने तो नही, तो भी युवाओं पर, जिन्हे कि कल देश की बागडोर संभालनी है, उनका असर है और उनके ही द्वारा शुरू हुआ आंदोलन ‘ भारत युवा संघ ‘ इस समय युवाओं में विशेष प्रभाव रखता है| उनके विचार बिल्कुल अलग ढंग के हैं| उनके विचार एक ही शब्द में बताए जा सकते हैं – ” वापस वेदों की और लौट चलो | ” ( बैक टू वेदस ) | यह आवाज़ सबसे पहले आर्य समाज ने उठाई थी| इस विचार का आधार इस आस्था में है कि वेदों में परमात्मा नें संसार का सारा ज्ञान उडेल दिया है| इससे आगे और अधिक विकास नहीं हो सकता| इसलिए हमारे हिन्दुस्तान ने चौतरफ़ा जो प्रगती कर ली थी उससे आगे न दुनिया बढ़ी है न बढ़ सकती है! खैर वासवानी आदि इसी आस्था को मानते हैं| तभी एक जगह कहते हैं -
” हमरी राजनीति ने अब तक कभी तो मैज़िनी और वोल्टएर को अपना आदर्श मानकर उदाहरण स्थापित किए हैं और या कभी लेनिन और तोल्स्तोय से सबक सीखा| हालाँकि उन्हे ज्ञात होना चाहिए कि उनके पास उनसे कहीं बड़े आदर्श हमारे पुराने ऋषि हैं| ” वे इस बात पर यकीन करते हैं कि हमारा देश एक बार तो विकास की अंतिम सीमा तक जा चुका था और आज हमें आगे कहीं भी जाने की आवश्यकता नही, बल्कि पीछे लौटने की ज़रूरत है|
आप एक कवि हैं | कवित्व आपके विचारों में सभी जगह नज़र आता है| साथ ही यह धर्म के बहुत बड़े उपासक हैं| यह ‘ शक्ति ‘ धर्म चलना चाहते हैं| यह कहते हैं ” इस समय हमें शक्ति की अत्यंत आवश्यकता है| ” वह ‘ शक्ति ‘ शब्द का अर्थ केवल भारत के लिए इस्तेमाल नही करते| लेकिन उनको इस शब्द से एक प्रकार की देवी का, एक विशेष ईश्वरीय प्राप्ति का विश्वास है| वे एक बहुत भावुक कवि की तरह कहते हैं
” For in solitude have communicated with her, our admired Bharat Mata , And my aching head had heard voice saying ….’ The day of freedom is not far off.’….Sometimes indeed a strange feeling visits me and I say to myself – Holly , holy is Hindustan. For still is she under the protection of her mighty Rishis and their beauty is around us, but we behold it not.”
अर्थात एकांत में भारत की आवाज़ मैने सुनी है| मेरे दुखी मन ने कई बार यह आवाज़ सुनी है कि ‘ आज़ादी का दिन दूर नहीं ‘….कभी कभी बहुत अजीब विचार मेरे मन में आते हैं और मैं कह उठता हूँ, हमारा हिन्दुस्तान पाक और पवित्र है क्योंकि पुराने ऋषि उसकी रक्षा कर रहे हैं और उनकी खूबसूरती हिन्दुस्तान के पास है | लेकिन हम उन्हे देख नही सकते|
यह कवि का विलाप है कि वह पागलों या दीवानो की तरह कहते रहते हैं : “
हमारी माता बड़ी महान है| बहुत शक्तिशाली है| उसे प्रस्त करने वाला कौन पैदा हुआ है| ” इस तरह वे केवल मात्र भावुकता की बातें करते हुए कह जाते हैं :
Our national movement must become a purifying mass movement. If it is to fulfil its destiny without falling into class war one of the dangers of Bolshevism.”
अर्थात हमें अपने राष्ट्रीय जन -आंदोलन को देश – सुधार का आंदोलन बना देना चाहिए | तभी हम वर्ग युद्ध के बोलेश्विज्म के ख़तरों से बच सकेंगे| वह इतना कहकर ही कि ग़रीबों के पास जाओ, उनको दवा – दारू मुफ़्त दो — समझते हैं कि हमारा कार्यक्रम पूरा हो गया| वे छायवादी कवि हैं| उनकी कविता का कोई विशेष अर्थ तो नहीं निकल सकता मात्र दिल का उत्साह बढ़ाया जा सकता है| बस पुरातन सभ्यता के शोर के अलावा उनके पास कोई कार्यक्रम नही| युवाओं के दिमाग़ों को वे कुछ नया नही देते| केवल दिल को भावुकता से ही भरना चाहते है| उनका युवाओं में बहुत असर है| ओर भी पैदा हो रहा है| उनके दकियानूसी और साक्षिप्त से विचार यही हैं जो कि हमने उपर बताए हैं| उनके विचारों का राजनीतिक क्षेत्र में सीधा असर न होने के बावजूद बहुत असर पड़ता है| विशेषकर इस कारण कि नौजवानों , युवाओं को ही कल आगे बढ़ना है और उन्ही के बीच इन विचारों का प्रचार किया जा रहा है|
अब हम सुभाष चन्द्र बोस और श्री जवाहर लाल नेहरू के विचारों पर आ रहे हैं| दो-तीन महीनो से आप बहुत -सी कान्फ्रेंसों के अध्यक्ष बनाए गये और आपने अपने विचार लोगो के सामने रखे| सुभाष बाबू को सरकार तख्ता पल्ट गिरोह का सदस्य समझती है और इसीलिए उन्हे बंगाल अध्यादेश के अंतर्गत क़ैद कर रखा था| आप रिहा हुए और गर्म दल के नेता बनाए गये| आप भारत का आदर्श पूर्ण स्वराज्य मानते हैं, और महाराष्ट्र कान्फ्रेंस में अध्यक्षीय भाषण में आपने इसी का प्रचार किया|
पंडित जवाहर लाल नेहरू स्वराज पार्टी के नेता पंडित मोती लाल नेहरू जी के सुपुत्र हैं| बैरिस्टरी पास हैं| आप बहुत विद्वान हैं| आप रूस आदि का दौरा कर आए हैं| आप भी गर्म दल के नेता हैं और मद्रास कान्फ्रेंस में आपके और आपके साथियों के प्रयासों से ही पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव स्वीकृत हो सका था| आपने अमृतसर कान्फ्रेंस के भाषण में भी इसी बात पर ज़ोर दिया| लेकिन फिर भी इन दोनों सज्ज्नो के विचारों में ज़मीन आसमान का अंतर है| अमृतसर और महाराष्ट्र कान्फ्रेंसों के इन दोनों अध्यक्षों के भाषण पढ़कर ही हमें इनके विचारों का अंतर स्पष्ट हुआ था| लेकिन बाद में बंबई के एक भाषण में यह बात स्पष्ट रूप से हमारे सामने आ गयी| पंडित ज्वाहर लाल नेहरू इस जन सभा की अध्यक्षता कर रहे थे और सुभाष चंद्र ने भाषण किया| वह एक बहुत भावुक बंगाली है| उन्होनें भाषण आरंभ किया कि हिन्दुस्तान का दुनिया के नाम एक विशेष संदेश है| वह दुनिया को अध्यात्मिक शिक्षा देगा| खैर आगे वह दीवाने की तरह कहना आरंभ कर देते हैं…. चाँदनी रात में ताज महल को देखो और जिस दिल की यह समझ का परिणाम था, उसकी महानता की कल्पना करो| सोचो एक बंगाली उपन्यासकार ने लिखा है कि हममें ‘ यह हमारे आँसू ही जम-जमकर पठार बन गये हैं|’ वह भी वापस वेदों की ओर ही लौट चलने का आह्वान करते हैं| आपने अपने पूना वाले भाषण में ‘ राष्ट्रीयता ‘ के संबंध में कहा है कि अंतरराष्ट्रीयतावादी, राष्ट्रीयतावाद को एक संकीर्ण दायरे वाली विचारधारा बताते हैं, लेकिन यह भूल है| हिन्दुस्तानी राष्ट्रीयता का विचार ऐसा नहीं है| वह न संकीर्ण है| न निजी स्वार्थ से प्रेरित है और न उत्पीड़नकारी है, क्योंकि उसकी जड़ या मूल तो यह ‘ सत्यम शिवम सुन्दरम ‘ है, अर्थात ‘ सच , कल्याणकारी और सुंदर|’
यह भी छायावाद है| कोरी भावुकता है| साथ ही उन्हे भी अपने पुरातन युग पर बहुत विश्वास है| वह प्रत्येक बात में अपने पुरातन युग क़ी महानता देखते हैं| पचायती राज का ढंग उनके विचार में कोई नया नहीं| ‘ पंचायती राज और जनता का राज ‘ वे कहते हैं कि हिन्दुस्तान में बहुत पुराना है| वे तो यह तक कहते हैं कि साम्यवाद भी हिन्दुस्तान के लिए कोई नई चीज़ नहीं| खैर उन्होने सबसे ज़्यादा उस दिन के भाषण में ज़ोर जिस बात पर दिया था वह यह थी कि हिन्दुस्तान का इस दुनिया के लिए विशेष संदेश है| पंडित ज्वाहर लाल आदि के विचार इसके बिल्कुल विपरीत हैं| वे कहते हैं -
” जिस देश में जाओ वही समझता है कि उसका दुनिया के लिए एक विशेष संदेश है| एंग्लैंड दुनिया को संस्कृति सिखाने का ठेकेदार बनता है| मैं तो कोई विशेष बात अपने देश के पास नहीं देखता| सुभाष बाबू को उन बातों पर बहुत यकीन है|” जवाहर लाल कहते हैं – ” Every youth must rebel . Not only in political sphere, but in social, economic and religious spheres also. I have not much use for any man who comes and tells me that such and such thing is said in Koran , Everything unreasonable must be discarded even if they find authority for it in Vedas And Koran .”( यानी ) ” प्रत्येक नौजवान को विद्रोह करना चाहिए| राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक, और धार्मिक क्षेत्र में भी| मुझे ऐसे व्यक्ति की कोई आवश्यकता नहीं जो आकर कहे कि फलाँ बात क़ुरान में लिखी हुई है| कोई बात जो अपनी समझदारी की परख में सही साबित न हो उसे चाहे वेद और क़ुरान में कितना ही अच्छा क्यों न कहा गया हो, नहीं माननी चाहिए|”
यह एक युगांतरकारी के विचार हैं और सुभाष के एक राज परिवर्तनकारी के विचार हैं| एक के विचार में हमारी पुरानी चीज़ें बहुत अच्छी हैं और दूसरे के विचार में उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया जाना चाहिए| एक को भावुक कहा जाता है और दूसरे को युगांतरकारी और विद्रोही! पंडित जी एक स्थान पर कहते हैं — ” To those who still fondly cherish old ideas and are striving to bring back the conditions which prevailed in Arabia 1300 years ago or in the Vedic Age in India . I say , that it is inconceivable that you can bring back the hoary past . The world of reality will not retrace its steps , the world of imagination may remain stationary.”
वे कहते हैं कि जो अब भी क़ुरान के जमाने के , अर्थात १३०० बरस पीछे के अरब की स्थितियाँ पैदा करना चाहते हैं या जो पीछे वेदों के जमाने की ओर देख रहे हैं उनसे मेरा यही कहना है कि यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि वह युग वापस लौट आएगा, वास्तविक दुनिया पीछे नहीं लौट सकती, काल्पनिक दुनिया को चाहे कुछ दिन यहीं स्थिर रखो| और इसीलिए वे विद्रोह की आवश्यकता महसूस करते हैं|
सुभाष बाबू पूर्ण स्वराज के समर्थन में हैं क्योंकि वे कहते हैं कि अंग्रेज पश्चिम के वासी हैं| हम पूर्व के| पंडित जी कहते हैं, हमें अपना राज कायम करके सारी सामाजिक व्यवस्था बदलनी चाहिए| उसके लिए पूरी-पूरी स्वतंत्रता प्राप्त करने की आवश्यकता है|
सुभाष बाबू मजदूरों से सुहानुभूति रखते हैं और उनकी स्थिति सुधारना चाहते हैं| पंडित जी एक क्रांति करके सारी व्यवस्था ही बदल देना चाहते हैं| सुभाष भावुक हैं — दिल के लिए नौजवानों को बहुत कुछ दे रहे हैं, पर मात्र दिल के लिए| दूसरा युगांतरकारी है जो कि दिल के साथ- साथ दिमाग़ को भी बहुत कुछ दे रहा है –They should aim at Swaraj for the masses based on socialism . That was the revolutionary change that they could not bring about without revolutionary methods ….Mere reform or gradual repairing of the existing machinery could not achieve the real proper Swaraj for the General Masses.”( अर्थात ) हमारा आदर्श समाजवादी सिद्धांतों के अनुसार पूर्ण स्वराज्य होना चाहिए, जोकि युगांतरकारी तरीकों के बिना प्राप्त नहीं हो सकता| केवल सुधार और मौजूदा सरकार की मशीनरी की धीमी धीमी की गई मरम्मत जनता के लिए वास्तविक स्वराज्य नहीं ला सकती|
यह उनके विचारों का ठीक-ठीक अक्स है| सुभाष बाबू राष्ट्रीय राजनीति की और उतने समय तक ही ध्यान देना आवश्यक समझते हैं जितने समय तक दुनियाँ की राजनीति में हिन्दुस्तान की रक्षा और विकास का सवाल है| परन्तु पंडित जी राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरे में से निकलकर खुले मैदान में आ गये हैं|
अब सवाल यह है की हमारे सामने दोनों विचार आ गये हैं| हमें किस ओर झुकना चाहिए? एक पंजाबी समाचारपत्र ने सुभाष की तारीफ़ के पुल बाँधकर पंडित जी के बारे में कहा था कि ऐसे विद्रोही पत्थरों से सिर मार-मारकर मर जाते हैं| ध्यान रखना चाहिए कि पंजाब पहले ही बहुत भावुक प्रांत है| लोग जल्द ही जोश में आ जाते हैं और जल्द ही झाग क़ी तरह बैठ जाते हैं|
सुभाष आज शायद दिल को कुछ भोजन देने के अलावा कोई दूसरी मानसिक खुराक नहीं दे रहे हैं| अब आवश्यकता इस बात की है कि पंजाब के नौजवानों को इन युगांतरकारी विचारों को खूब सोच विचारकर पक्का कर लेना चाहिए| इस समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख़्त ज़रूरत है और वह पंडित ज्वाहर लाल नेहरू से ही मिल सकता है| इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अंधे पैरोकार बन जाना चाहिए| लेकिन जहाँ तक विचारों का संबंध है, वहाँ इस समय पंजाबी नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इन्क्लाब के वास्तविक अर्थ, हिन्दुस्तान में इन्क्लाब की आवश्यकता, दुनिया में इन्क्लाब का स्थान क्या है, आदि के बारे में जान सकें| सोच विचार के साथ नौजवान अपने विचारों को स्थिर करें ताकि निराशा, मायूसी और पराजय के समय में भी भटकाव के शिकार न हों और अकेले खड़े होकर दुनिया से मुक़ाबले में डटे रह सकें| इसी तरह जनता इन्क़लाब के ध्येय को पूरा कर सकेगी|
From : Bhagat Singh Aur unke Sathiyon ke sampooran uplabdh dastavez
सितम्बर 16, 2008
भगत सिंह की बात सुनों, नई क्रांति की राह चलो !!
Posted by विचार मंच, under Uncategorized[2] Comments
पाकिस्तानी लोगों के भगत सिंह पर विचार : वीडियो


